Sunday, 30 October 2011

जा रहीं देवता से मिलने ?
तो इतनी कृपा किये जाओ।
अपनी फूलों की डाली में
दर्पण यह एक लिये जाओ।

आरती, फूल से प्रसन्न
जैसे हों, पहले कर लेना;
जब हाल धरित्री का पूछें,
सम्मुख दर्पण यह धर देना।

बिम्बित है इसमें पुरुष पुरातन
के मानस का घोर भँवर;
है नाच रही पृथ्वी इसमें,
है नाच रहा इसमें अम्बर।

यह स्वयं दिखायेगा उनको
छाया मिट्टी की चाहों की,
अम्बर की घोर विकलता की,
धरती के आकुल दाहों की।

ढहती मीनारों की छाया,
गिरती दीवारों की छाया,
बेमौत हवा के झोंके में
मरती झंकारों की छाया।             रामधारी सिंह दीनकर

भ्रष्टाचार किसे कहते हैं ? भ्रष्टाचार को परिभाषित करना एक कठिन कार्य है । मात्र घूस लेना ही भ्रष्टाचार के अन्तर्गत नहीं आता है । मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ, जो सरकारी सेवा में हैं और एक पैसा भी घूस नहीं लेते हैं, परन्तु वे अपनी डि‌‌यूटी भी नहीं करते हैं । पहली बात कि वे  कार्यालय ही नहीं आते हैं और यदि भूल बस आ भी जाते हैं तो दिन भर कुर्सी तोड कर और गप्पें लडा कर शाम को घर चले जाते हैं । वे सीना तान कर कहते हैं कि मैं तो पूर्ण ईमानदान हूँ, एक पैसा भी घूस नही लेता हूँ । मैं पूछता हूँ, क्या उनका पूरा वेतन ही घूस नहीं हुआ ।
मैं वैसे लोगों को भी जानता हूँ,  जो एक पैसा भी घूस नहीं लेते हैं, परन्तु अपने जातिवालों को या अपने रिस्तेदानों को फायदा पहुचाने के लिये किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं । उन्हे` किस श्रेणी में रखा जाएगा ? उन्हे भ्रष्टाचारियों की श्रेणी में रखा जाएगा या नहीं ।
 दूसरी ओर मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूँ जो पूरी लगन और मेहनत से अपनी डि‌‌यूटी निभाते हैं, निर्धारित समय सीमा से अधिक कार्य करते हें । वह सरकारी सेवक किसी व्यङ्कित का कोई कार्य कर देता है और उस किये हुए कार्य के एवज में उस व्यक्ति द्बारा अपनी खुशी से उस सरकारी सेवक को कोई पुरस्कार या उपहार या कुछ राशि दी जाती है । सरकारी सेवक उक्त पुरस्कार या राशि को ग्रहण कर लेता हैं । इस मजबूरी में कि सरकार द्बारा निर्धारित वेतन से उसके बडे से परिवार का भरण पोषण नही हो पाता है । वह उस सी छोटी से तनख्वाह में अपने पुत्र को इच्छित कालेज में शिक्षा नहीं दिला सकता है । इस सरकारी सेवक के कृत्य को क्या कहा जाएगा ? निश्चित रूप से यह भी भ्रष्टचार ही हैं, परन्तु इस भ्रष्टाचार का उत्प्रेरक कौन है ?