सारूप्य मोक्ष का मार्ग
पांडवों और कौरवों के बीच भगवान श्रीकृष्ण के सुलह कराने का प्रयास विफल हो चुका था । दुर्योधन पांडवों को मात्र पॉच गॉव भी देने को तैयार न हुआ था। अब युद्ध अवश्यमभावी हो चुका था । दोनों पक्ष अपनी अपनी शक्तिों को बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील थे । नकुल और सहदेव के अपने मामा शल्य अपनी सेना के साथ पांडवों की सहायता के लिए आ रहे थे । उनसेे छल करके दुर्योधन ने वचन प्राप्त कर लिया और विवश हो शल्य को दुर्योधन की तरफ से युद्ध करना पड़ा था । दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण की नारायणी सेना प्राप्त कर ली थी और पांडवों को निहत्थे कृष्ण मिले थे ।
एक दिन नदी में स्नान करते समय द्रोणपुत्र अश्वस्थामा को विचार आया कि श्रीकृष्ण ने तो युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा कर ली है तो उनके आयुधो का क्या होगा । वे तो बेकार ही पड़े रहेगे । क्यों न श्रीकृण से उनका कोई आयुध मॉग लिया जाए । उनके पास जो सुदर्शन नाम का चक्र है वह बड़ा ही चमत्कारी चक्र है । सुना है, उसका वार कभी खाली नहीं जाता है । शत्रु का सिर काट कर वह पुनः तर्जनी पर स्थापित हो जाता है । अगर वह चक्र मुझे मिल जाए तो युद्ध में मेरा सामना करने वाला कोई नहीं रह जाएगा और मैं एक ही दिन में इस युद्ध को जीत लूॅगा । वैसे भी मैं तो एक ब्रह्मण हॅू । मुझे तो मॉगने का अधिकार है ही । श्रीकृष्ण भी इन्कार नहीं कर सकते है । अपने विचारों पर अश्वस्थामा बहुत ही खुश हुआ और दूसरे दिन ही द्वारका के लिये प्रस्थान कर गया ।
अरूणोदय हो चुका था । भगवान श्रीकृष्ण स्नान करके पूजा से निवृत्त हो चुके थे । अब वे उपस्थित याचकों को दान दे रहे थे । प्रतिहारी एक एक करके याचकोे को उपस्थित करा रहा था । श्रीकृष्ण उनसे उनकी वांछा पूछ रहे थे और पूरा कर रहे थे । तभी एक तरूण ब्रह्मण कुमार उनके समक्ष उपस्थित किया गया । श्रीकृष्ण ने उसे पहचान लिया और हॅस पड़े । फिर बोले -
‘‘ अहो ! दुर्योधन के परम मि़त्र, अश्वस्थामा को भी मुझसे याचना करने की अवश्यकता आन पड़ी ! कहिये ब्रह्मण कुमार आपको क्या चाहिये ? मैं आपका क्या प्रिय करूॅ ? मेरे लिये ऐसा कुछ भी अदेय नहीं है, जिसे आप प्राप्त करने की योग्यता और शक्ति रखते हों । ‘‘
भगवान श्रीकृष्ण की बात सुन कर अश्वस्थामा ने मन ही मन सोचा कि जबतक इस संसार में तुम्हारे जैसे धर्मभिरू दाता रहेगें तबतक मुझ जैसे चतुर व्यक्ति को अपना स्वार्थ सिद्ध करने में क्या कठिनाई हो सकती है । ऐसा सोच कर वह निर्लज्जतापूर्वक हॅस पड़ा और बोला -
‘‘ अच्छी तरह सोच लीजिए माधव ! कहीं वचन दे कर आप वांछित वस्तु नहीं दे सके तो आपको लज्जित होना पड़ेगा । मेरा उद्देश्य आपको लज्जित करना कदापि नहीं है । ‘‘
‘‘ श्रीकृष्ण के लिये कुछ भी अदेय नहीं है ब्रह्मण कुमार । आप निःसंकोच याचना कीजिए । ‘‘
‘‘ यदि ऐसी बात है तो हे माधव ! मुझे आपका सुदर्शन चक्र चाहिए । आप मुझे वही दे कर कृतार्थ करें । ‘‘
अन्तर्यामी हॅस पड़े और बोले -
‘‘ इतनी छोटी से वस्तु की याचना के लिये ब्रह्मण कुमार इतना संकोच कर रहे थे । आप मेरा सुदर्शन चक्र ले जा सकते है । ‘‘
गोविन्द ने पास खड़े एक सैनिक से कहा -
‘‘ सैनिक ! ब्रह्मण कुमार को आयुधागार में सुदर्शन चक्र के समीप पहुचा दो । ‘‘
अश्वस्थामा की तो बॉछे खिल उठी । वह खुशी से पागल हो रहा था । अब उसके समान योद्धा इस संसार में कोई नहीं होगा । सुदर्शन चक्र की सहायता से हृषीकेश को भी हराने का स्वप्न देखता हुआ वह सैनिक के साथ आयुधागार में उस स्थान पर आ गया, जहॉ सुदर्शन रखा हुआ था । सुदर्शन की ओर इंगित कर सैनिक चुपचाप पीछे खड़ा हो गया ।
अश्वस्थामा सुदर्शन के समीप आया । उसे हसरत भरी नजरों से देखा । आगे बढ़ कर उसे स्पर्श किया । और फिर उठा लेना चाहा । लेकिन यह क्या ? यह सुदर्शन चक्र तो बड़ा भारी है । उठाता ही नहीं । उसने उसे दोनों हाथो से उठाना चाहा । लेकिन फिर भी, वह चक्र टस से सम न हुआ । घुटने के सहारे बैठ कर दोनों हाथों से जोर लगा कर, चक्र को सर पर उठा कर ले जाने का भी प्रयास किया । लेकिन सारे प्रयास व्यर्थ रहे।
लज्जा से सिर झुकाए हुए सैनिक से साथ अश्वस्थामा आयुधागार से लौट आया । उसे खाली हाथ आया देख श्रीकृष्ण हॅस पड़े और बड़ा ही सारगर्भित
बात कही -
‘‘ मुझे दुःख है कि तुम सुदर्शन चक्र को नहीं उठा सके । लेकिन मुझसे कोई वस्तु मॉगने के पहले तुम्हें यह तो सोच लेना चाहिए था कि उस वस्तु को धारण करने की शक्ति और क्षमता तुममें है भी या नहीं । मेरे सारी विभूतियॉ तुमलोगों के लिए ही है । लेकिन उसे पाने के लिये, उसे धारण करने के योग्य तो तुझे खुद ही बनना होगा । जो जितना धारण कर सकता है उसे उतनी विभूति तो मिलती ही है । अब तुम जाओ
! पहले अपनी ज्ञानशक्ति इच्छाशक्ति और क्रियाशक्ति को और अधिक संवृद्धि करा,े उत्तरोत्तर संवृद्धि करो । फिर मेरी सारी विभूति मेरी सारी शक्ति हस्तगत करके मुझ जैसा ही बन जाओ । ‘‘
कहानी तो बस इतनी ही है । मै अल्पज्ञ इसे नहीं जानता पर शायद हमारे मनिषीगण श्रीकृष्ण के इस वक्तव्य को ही सारूप्य मोक्ष का मार्ग कहते है ।