Sunday, 30 October 2011

जा रहीं देवता से मिलने ?
तो इतनी कृपा किये जाओ।
अपनी फूलों की डाली में
दर्पण यह एक लिये जाओ।

आरती, फूल से प्रसन्न
जैसे हों, पहले कर लेना;
जब हाल धरित्री का पूछें,
सम्मुख दर्पण यह धर देना।

बिम्बित है इसमें पुरुष पुरातन
के मानस का घोर भँवर;
है नाच रही पृथ्वी इसमें,
है नाच रहा इसमें अम्बर।

यह स्वयं दिखायेगा उनको
छाया मिट्टी की चाहों की,
अम्बर की घोर विकलता की,
धरती के आकुल दाहों की।

ढहती मीनारों की छाया,
गिरती दीवारों की छाया,
बेमौत हवा के झोंके में
मरती झंकारों की छाया।             रामधारी सिंह दीनकर

1 comment:

  1. रमेश जी.. दिनकर जी की सुन्दर रचना प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद.
    कुमार विश्वास जी के बारे आपके विचार से मैं सहमत हूँ, उन्हें पहले किसी योग्य शिक्षक के लिए अपना पद छोड़ देना चाहिए , फिर आंदोलन में पूरे समय के लिए शामिल होना चाहिए..

    आपका मेरे ब्लॉग पर आना अच्छा लगा..आभार. आगे भी उम्मीद रखूँगा.

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