Thursday, 3 November 2011

जुआ




जुआ, जैसा कि इसके नाम के पीछे लगने वाले क्रिया ‘‘खेलना‘‘ से स्पष्ट है कि यह एक खेल है । आम तौर पर खेल उस क्रिया को कहते हैं जिसे लोग अपने मनोरंजन या दूसरों के मनोरंजन के लिये करते है । लेकिन जुआ एक ऐसा खेल है, जिसे लोग दूसरों के मनोरंजन के लिये तो हरगिज नहीं खेलते हैं । लोग इसे अपने मनोरंजन के लिये भी नहीं खेलते हैं बरन् आसानी से अर्थ प्राप्ति के लालच या स्वार्थवश खेलते है । मेरे हिसाब से अगर जुआ को परिभाषित किया जाय तो यह इस प्रकार होगा कि ‘‘ जिस क्रिया से आप बिना मेहनत किये, केवल अपने भाग्य के सहारे दूसरो का पैसा हड़प जाये या दूसरो को क्षति पहुचा कर अपना लाभ प्राप्त करे, उस क्रिया को जुआ खेलना कहते हैं ।‘‘
जहॉ तक मेरी जानकारी है, जुआ खेल कर कोई फौरी तौर पर भले कुछ धन अर्जित कर ले, परन्तु वो धन स्थयी रूप से टिकता नहीं है। अगर किसी के पास टिक भी गया तो उसे अपवाद ही समझिये । हॉ एक व्यक्ति है, जिसे जुआ से बराबर लाभ होता है । कोई हारे या जीते उसे तो लाभ होना ही है । वह व्यक्ति जुआ खेलाने वाला होता है । यह व्यक्ति या तो जूए एक दाव पर से नाल के पैसे ले कर, या फिर खिलाड़ियों को खेलने के लिये जगह देने के एवज में उनसे पैसा प्राप्त करके या उस खेल को एक शो के रूप में प्रदर्शित करके पैसा प्राप्त करता है । यकिन मानिये इन जुआ खेलाने वाले प्राणियों को फायदा ही फायदा है । चाहे दूसरों को कितनी भी हानि क्यों नहीं हो जाय ।
आईये अब जरा विषयान्तर हो लें । कुछ लोग भारतवर्ष की गरीबी को विदेशो में बेचने का धंधा करते रहे है । सत्यजीत रे ने पाथेर पांचाली और अपनी बहुत सी फिल्मों में बंगाल के गरीबी और भुखमरी को बड़े मार्मिक ढ़ग से प्रदर्शित किया है । जब सत्यजीत रे को आस्कर मिला तो आलोचको ने आरोप लगाया था कि उन्होंने भारत की गरीबी और भुखमरी को विदेशो में बेचा है । मैं भी उन आलाचनाओं से सहमत हॅू ।
आजकल भी एक प्लेटफार्म से लगातार भारत की गरीबी को प्रदर्शित किया जा रहा है । वह प्लेटफार्म है के0बी0सी0 । यहॉ आने वाले 90 प्रतिशत प्रतिभागियों से यह कहलाया जाता है कि वे कितने लाचार और गरीब है । कितने असहाय है । वे प्रतिभागी अपनी गरीबी और फटेहाली का कुछ यूॅ वर्णन करत है, मानों अपने हालात को अधिक से अधिक एक्सपोज करके अधिक से अधिक धन की अपेक्षा रखते हो । 
यह सत्य है कि भारत में गरीबी है, भूखमरी है, बेरोजगारी भी है । लेकिन किस देश में यह सब नहीं है । कमोबेस पूरा विश्व इन समस्याओं से घिरा है । जरूरी तो नहीं कि हम दूसरों के सामने अपनी गरीबी और लाचारी का ढ़िढ़ोरा पीटें । परन्तु यह ढ़िढ़ोरा तो उनसे सत्यजीत रे के नक्शे कदम पर चलते हुए पिटवाया जाता है ।  और ये प्रतिभागी जो जीत के जाते हैं वे अपनी प्रतिभा से नहीं जीतते वरन् वे जीतते हैं तो अपनी किस्मत से । यह जरूरी नहीं कि के0बी0सी0 के सभी प्रश्नों का उत्तर देने वाला प्रतिभागी, उस प्रतिभागी से ज्यादा प्रतिभावान हो जो मात्र छः या सात सवालों का जवाब दे कर आउट हो जाते हैं ।
अब आप ही निर्णय कीजिये कि यह खेल जिसे के0बी0सी0 कहते हैं, एक जुआ है अथवा नहीं । इसके होस्ट श्री अमिताभ बच्चन यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि इस खेल के माध्यम से उन्होंनं जाने कितने लोगों की तकदीर बदल दी है । मैं पूछता हॅू कि क्या कुछ लाख रूपया किसी की तकदीर बदल सकता है । हरगिज नहीं । आपकी तकदीर अगर कोई बदल सकता है तो वह है आपका पुरूषार्थ, आपके कर्म और आपकी मेहनत । किसी जुआ में जीता हुआ  धन तो कब और कैसे अपके हाथों से फिसल जाएगा यह आपको पता भी नहीं चलेगा ।
हॉ इस खेल से कोई अपनी किस्मत बदल रहा है तो निश्चित रूप से इसे खेलाने वाला- चाहे जो भी इसका प्रोड्यूसर हो । और इसके होस्ट साहब । आपको याद होगा इन्होंने ए0बी0सी0 प्रोडक्सन कंपनी खोली थी और एक फैशन शो औरगेनाईज किया था । यह दोनों फ्लाप हो गये थे । और इनकी हालत उन दिनों कुछ अच्छी नहीं थी । परन्तु इसी के0बी0सी0 ने इनकी हालत सुधार दी । इन्होंने भी तकदीर के सहारे, जुआ खेल के अपनी हालात नहीं सुधारी अपितु कठिन परिश्रम एवं अपने अलौकित प्रतिभा का उपयोग करके इस कार्यक्रम को सुपर कार्यक्रम बनाया । टी0भी0 पर यह के0बी0सी0 छा गया और इसके होस्ट और प्रोड्यूसर धनी से धनकुबेर होते गये । दूसरी ओर वे लोग भी हैं जो इसके प्रथम सेसन में यानि 2000-2001 में लाखों रूपये जीते हैं परन्तु इन दस सालों में इस धन से वे लखपति से करोड़पति बन गये या करोड़पति से अरबपति बन गये ऐसा तो सुनने में नहीं आया ।
अन्त में मैं इतना ही कहना चाहता हॅू कि आपकी की तकदीर जुआ से नहीं बदली जा सकती है । अगर सचमुच आप अपनी तकदीर बदलना चाहते हैं तो सकारात्मक सोच के साथ कठिन एवं अथक परिश्रम करने की जरूरत है । सच मानिये दूनिया में यही एक चीज है जो आपके भाग्य को बदल सकता है ।

2 comments:

  1. There is a sharp difference between a game and the gamble. Whereas excellence in a game requires consistent practice to develop the basic skills or inborn qualities, gambling also requires sharp intelligence and ability to predict. Gambling may be a part of the game but vice versa is not possible. In my opinion “Gambling is a process in which one or more individuals knowingly put their earning at stake to get multiplied returns”.

    The definition of gambling used in above opinion largely denotes “American Diplomacy” excluding the luck factor. Analyze the American diplomatic affairs in Middle East, East Asia or Africa you will find this above definition accurate but of course exclude the luck factor.

    In the era of globalization and free market trade, the existing thin line between the gambling and intelligent trade is gradually diminishing. Take the example of share trading and investment in real estate, it may be gambling according to one perception but for others it is intelligent trade. Nothing required to multiply your money in shortest span of time without taking much hardship in both these forms of gambling/ intelligent trade except for capacity to invest and ability to predict.

    In my perception KBC is not a gambling at all. Reason, you do not require any investment to multiply your gain. There is ofcourse a process of selection which is quite tough even for educated middle class Indian. And at last, in this form of game nobody is at loss, the host (anchor), the guest (player), the producer, the channel every stakeholder of the game is at gain. In my perception it is an "intelligent business model" ofcourse.

    As far as selling the picture of poor India is concerned, I would like to let you memorize that a few days back the chairperson of planning commission has annonced that a person who is capable of spending Rs 32 in urban India and Rs 26 in rural India par day is above poverty line. Now please tell me, whom he was trying to attract? Obviously, the world bank, and other financial institutions around the world to show that India is not a poor state and very attractive for investment. And if some individual or institution is posing the real picture of India to the world what is wrong with it. Take a look at the development statistics and in many of them you will find India even behind Bangladesh, Pakistan and Sri Lanka. Needless to compare with the developed world.

    I completely agree that gambling cannot change the destiny. But what is gambling in today’s free market is a matter of debate. Positive thinking of course is the most important factor to change your destiny but that is too along with hard work. But what of a farmer in Indian perception who his whole life does very hard work but finally dies in debt.

    KBC certainly is not the destiny changer but has given a few lucky participants the opportunity to fulfill their basic needs and social inspirations that are largely responsibilities of the welfare state and the State has miserably failed to do so after more than sixty years of independence.

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  2. मैं आपके तीन पाराग्राफ्स से पूर्णतः तो नहीं-- लगभग पूर्णतः सहमत हॅू लेकिन जहॉ तक के0बी0सी0 का सवाल है, मैं आपकी विचारधारा से पूर्णतः असहमत हूँ । आपको गलतफहमी है कि यहॉ आने वाले प्रतिभागी अपना कोई धन नहीं लगाते है । अपको पता होना चाहिए कि खेल में जितने प्रतिभागियों को सम्मिलित किया गया है वो वर्षो तक धीरे धीरे करके बहुत ज्यादा राशि के एस0एम0एस0 और फोनकाल्स कर चुके होते हैं । आप फिर सोचेगें कि एस0एम0एस0 और फोनकाल्स के के0बी0सी0 को क्या फायदा हो सकता हैं इससे तो टेलिफोन आपरेटरो को ही फायदा होगा । तो यही आप भूल कर रहे हैं । के0बी0सी0 में किये जाने वाले एक एस0एम0एस0 की कीमत होती है 5 रूपये । इसी तरह फोनकाल्स के भी दर बहुत अधिक होते हैं । जनता से वसूली गई यह अधिक राशि किसी मिलती हैं । स्पष्टतः के0बी0सी0 को । यह अपने प्रचार में ही बढ़ी हुए दर की शर्त इतने छोटे छोटे अक्षरों में प्रकाशित करता है कि उसे शायद ही कोई तवजो दे । इसप्रकार आप इस वसूली गई राशि के विरूद्ध कोई शिकायत भी नहीं कर सकते हैं । लबोलबाब के0बी0सी0 ने पूरे भारतवर्ष को जूए का मंच बना दिया है । करोड़ो लोग एम0एम0एस0 और फोनकाल्स के जरिये अपना करोड़ो रूपया दाव पर लगा रहे हैं और यह कुछ प्रतिभागियों को कुछ हजार रूपये दे देता है । इसमें जो प्रतिभागी प्रत्यक्ष रूप से हमारे सामने आते हैं वो कुछ न कुछ जीतते हैं पर हम उन अप्रत्यक्ष प्रतिभागियों को नहीं देख पाते जो लाखों रूपया घर बैठे गवा देते हैं ।
    मुझे याद है कि प्लानिंग कमिशन द्वारा यह घोषित किया गया था कि अपने भोजन पर शहरी क्षेत्र में जो व्यक्ति 32 रूपये और देहाती क्षेत्र में 26 रूपये खर्च कर सकता हैं उसे गरीबी रेखा के उपर माना जाएगा । इसी बात पर श्री नीतीश कुमार ने यह कहा था कि कोई व्यक्ति 32 रूपये में एक शाम भी खाना खा कर दिखा दे तो वे मान जाएगें । एयरकंडिसन रूम में बैठ कर गरीबी और गरीबों का आकलन नहीं किया जा सकता है । श्री नीतीश के इस बयान ने प्लानिग कमिशन की किरकिरी कर दी थी ।
    आपने ठीक कहा कि ये सब विश्वबैंक को और बड़े बड़े उद्योगपतियों को आकृष्ट करने के लिये किये जाते हैं । ये भी ठीक ही है कि कुछ लाग भारतवर्ष की गरीबी और भुखमरी को बेंच कर या विदेशो में प्रदशित करके धन कमाते है । लेकिन ये दोनों गलत हैं । आपने बचपन में वो सात अंधों की कथा तो पढ़ी ही होगी जो हाथी को परिभाषित करने का प्रयत्न कर रहे थे । एक अंघा जो हाथी का कान पकड़े हुए था, वह कह रहा था कि हाथी सूप की तरह होता है । दूसरा जो पैर को पकड़ रखा था, इस बात पर अड़ा था कि हाथी तो केले के खम्भ की तरह होता है और जिसने सूढ़ पकड़ रखी थी, उसके मुताबिक हाथी सॉप की तरह था । कहने का अर्थ यह कि वे सभी गलत थे । उसी तरह हमारा प्लानिग कमिशन और भारत की गरीबी को बेंचने वाले वो तथाकथित लोग, दोनों की गलत हैं । मैं प्लानिग कमीशन को दोष इसलिये नहीं दे सकता कि वह सर्वजनसुखाय कार्य करता है । लेकिन जो देश का एकतरफा चित्र विदेशों में प्रस्तुत कर रहे है, वो तो स्पष्ट रूप से दोषी है, क्यों कि वे अपने स्वार्थ के लिये ऐसा करते हैं ।
    आपने भारतीय किसानों के बारे में लिखा है कि वे पूरी जिन्दगी मेहनत करते हैं और कर्ज में डूबे मर जाते हैं । केवल भारतीय किसान ही नहीं, आप और विस्तृत नजरो से देखेगे तो हजारो मजदूर और अन्य लोगां को भी देखेगें जो पूरी जिन्दगी पूरी मेहनत और इमानदारी से कार्य करते है और कुछ भी हासिल नहीं कर पाते हैं । अगर मैं इसकी व्याख्या करने लगूं तो पूरी तरह विषयान्तर हो जाना होगा । इस संदर्भ में मैं अभी इतना ही कहूँगा कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी क्षमता और अपनी सोच होती है । अब सागर में तो बहुत जल है, परन्तु आप के पास जितना बढ़ा मटका होगा उतना ही जल निकाल सकते हैं न । एक शिक्षक तो अपने सभी शिष्यों को समान रूप से शिक्षित करता है परन्तु कोई बहुत आगे निकल जाता है और कोई कुछ भी नहीं कर पाता है । यहॉ एक फैक्टर और है जिसे इसका जिम्मेवार माना जा सकता है वह यह है कि लोगों को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है । अब इसके लिये आप चाहे जिसे दोष दे लें । चाहे तो सरकार को दोषी कहे या फिर समाज को दोषी कहें । इस संदर्भ में मैं कुछ हद तक भारतीय दर्शन को भी दोषी मानता हूँ जो संतोषम् परम सुखम का पाठ पढ़ता है ।

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