Friday, 3 February 2012

नियति के आगे विवश है हम



कहीं किसी वीराने में
मिट्टी का ढ़ेला रहता था ।
वही पास में भूतल पर]
एक सूखा पत्ता रहता था ।

ढ़ेला को डर था वारिस से]
जो उसे मिटा कर रख देता ।
पत्ता को डर था ऑघी से]
जो उसे उड़ा कर ले जाता ।

ढे़ले ने पत्ते से ये कहा -
सुन ऐ मेरे प्यारे भइया ।

जब बरसेगा नभ से पानी]
तू मेरे सिर पर चढ़ जाना ।
और मेरी छतरी बन कर के]
पानी से मुझे बचा लेना ।

जब आएगी भीषण ऑधी]
मैं तुमपर झट चढ़ जाउगा ।
और तुम्हें दबा अपने तन से]
उड़ने से तुम्हें बचाउगा ।

नियति की लीला बड़ी अजब]
हम उससे पार न पा पाते ।
उसके निष्ठुर प्रहार से हम]
अपने को नहीं बचा पाते ।

एक दिन की बात सुनो भाई]
ऑधी पानी एक साथ आई ।
ऑधी पत्ते को उड़ा दिया]
पानी ढ़ेले को गला दिया ।

चाहे हम जितना करे जतन]
नियति के आगे विवश हैं हम ।
चाहे हम जितना करे जतन]
नियति के आगे विवश हैं हम ।


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