विभु सदैव शुभ करते हैं
बात उन दिनों की है जब पांडव जुए में हार कर बारह वर्षो का बनवारी जीवन व्यतीत कर रहे थे । अभी उनका बनवास आरंभ ही हुआ था अतः उनसे संवेदना व्यक्त करने बहुत से ब्राह्मण ऋषि मुनी और हितैसी आते रहते थे । युधिष्ठिर उनका आतिथ्य करने में अपने को असमर्थ पाते । उनके साथ भी बहुतेरे सेवक थे जिसका भरण पोषण कठीन हो रहा था ।
इस समस्या के ले कर एक दिन युधिष्ठिर अपने पुरोहित महर्षि धौम्य के पास पहुचे । अपनी सारी व्यथा अपने पुरोहित को बतायी और उसके निवारण का उपाय पूछा । धौम्य ने उन्हें समझाया कि इस जगत में भगवान सूर्य की कृपा से ही सभी प्राणियों को भोजन प्राप्त होता है । अतः युधिष्ठिर को भी भगवान सूर्य की शरण में जा कर उनकी उपासना करनी चाहिये ।
युधिष्ठिर विधिपूर्वक सूर्य की उपासना करने लगे । उनकी उपासना से प्रसन्न हो कर एक दिन भगवान सूर्य ने प्रकट को कर कहा कि वे युधिष्ठिर की उपासना से प्रसन्न है और युधिष्ठिर उनसे मनचाहा वर प्राप्त कर सकते है । युधिष्ठिर ने सूर्य देव को अपनी चिन्ता से अवगत कराया और उसके निदान की प्रार्थना की । सूर्य देव ने युधिष्ठिर को एक पात्र दिया और कहा कि हे युधिष्ठिर इस अक्षय पात्र को ग्रहण करो । इसे द्रौपदी को दे देना और उससे कहना कि वो इसी पात्र में भोजन बनाया करेगी । इस पात्र की विशेषता यह है कि जब तक द्रौपदी स्वयं न खाना खा लेगी तब तक चाहे जितने लोगों को भोजन करावो, इस पात्र में भोजन कम न होगा । परन्तु दौपदी के भोजन करने के पश्चात यह पात्र खाली हो जाएगा और फिर उसे दूबारा भोजन बनाना पड़ेगा ।
युधिष्ठिर ने प्रसन्नतापूर्वक पात्र ग्रहण किया और कुटि में आ कर उसे द्रौपदी के देते हुए सारी बातें बता दी । द्रौपदी भी बड़ी प्रसन्न हुई । अब नित्य प्रति दौपदी उस अक्षय पात्र में भोजन बनाने लगी । जितने भी बनवासी ऋषि मुनी ब्रह्मण ब्रह्मचारी उनकी कुटिया पर आते, उन्हें द्रौपदी प्रसन्नापूर्वक भोजन कराती और सबसे अन्त में स्वयं भोजन करती ।
पांडव बन में भी उचित अतिथि सत्कार करते हुए बड़ी प्रसन्नता से निवास कर रहे
थे । उधर दुर्योधन को अपने गुप्तचरों से सारी बातों की जानकारी मिलती रहती थी । वह पांडवों की प्रसन्नता को सहन नहीं कर पा रहा था और ईष्या से जला जा रहा था ।
एक दिन की बात है महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्यों के साथ धुमते धुमते दुर्योधन के महल में आ पहुचे । महर्षि दुर्वासा अपने क्रोध के कारण जगत विख्यात हैं । कब किस बात से क्रोधित हो उठेगें और शाप दे देगें ये पता भी नहीं चलता था । दुर्योधन की तो बॉछें खिल उठीं । वो बड़ी तन्मयता और लगन से महर्षि की सेवा करने लगा । महर्षि भी उसे क्रोध दिलाने और अवज्ञा करने के लिये प्ररित करते रहते । कभी तो आधी रात को कहते कि भूख लगी है, भोजन करावो और जब भोजन बना कर लाया जाता तो कहते कि भूख नहीं है और सारा भोजन फेकवा
देते । कभी आधी रात को कीर्तन आरंभ कर सबों की नींद हराम कर देते । महर्षि के इस प्रकार के अमावनीय व्यवहार पर भी दुर्योधन ने कभी क्रोध नहीं किया और उसी लगन तथा तत्परता से उनकी सेवा करता रहा ।
इस प्रकार करीब एक वर्ष व्यतीत हो गये । महर्षि दुर्वासा दुर्योधन की सेवाभाव से अत्यन्त प्रसन्न हुए और उससे वर मॉगने को कहा । दुर्याेधन ने कहा कि हे प्रभो, अगर आप मुझ पर सचमुच प्रसन्न हैं तो आप अपने सभी शिष्यों के साथ युधिष्ठिर का अतिथ्य ग्रहण कीजिए । लेकिन आप उनकी कुटिया पर तब जाये, जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हो । दुर्वासा ने एममस्तु कहा और वहॉ से चल दिये ।
दूसरे दिन महर्षि दुर्वासा ने एक शिष्य को युधिष्ठिर की कुटिया पर नजर रखने के लिये भेजा और उससे कहा कि जैसे ही दौपदी भोजन कर ले वह आ कर उन्हें बतावे । वह शिष्य टोह लेता रहा । जब द्रौपदी भोजन कर के विश्राम करने जाने लगी तब उसने महर्षि को इस बात की सुचना दी । महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्यों के साथ दनदनाते हुए आ धमके और युधिष्ठिर से भोजन की याचना की ।
युधिष्ठिर के तो हाथ पॉव फूल गये । द्रौपदी भोजन कर चुकी थी । कुटि में अन्न का दाना भी नहीं था । भाई भिक्षाटन के लिये जा चुके थे । अन्न आवेगा और फिर भोजन बनाया जाएगा, तब तक तो काफी देर हो जाएगी और यह ऋषि जरूर शाप दे कर चले जाएगें । शाप तो लगेगा ही, आतिस्थ्य धर्म भी भ्रष्ट होगा । जब युधिष्ठिर को कुछ न सूझा तो उन्होंने इस विपत्ति को कुछ देर तक टालने की गरज से कहा कि हे मुनवर यहॉ से कुछ ही दूरी पर निर्मल नदी बह रही
है । आप लोग स्नानादि से निवृत हो कर आये और आतिथ्य ग्रहण करें । अहो भाग्य जो मुझे आपके आतिथ्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ । महर्षि भी दूर से चल कर आये थे, थकावट तो थी ही, सोचा चलो स्नानादि से निवृत हो कर भी भोजन ग्रहण करना ठीक होगा और वे अपने शिष्यों के साथ नदी में स्नान करने के लिये चल पड़े ।
युधिष्ठिर ने द्रौपदी को जा कर सारी बातें बताई । द्रौपदी के भी हाथ पॉव फूल गये । उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि इस विकट परिस्थिति का समना किस प्रकार किया जाए । जब द्रौपदी को काई भी उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को याद करना शुरू किया । हे भगवन एक बार आपने दुर्योधन के सभागार में मेरी लाज बचाई थी आज भी मैं घोर विपत्ति में पड़ गई हॅू, मेरी रक्षा कीजिए प्रभु ।
अभी द्रौपदी प्रार्थना कर ही रही थी कि उसने देखा, मधुसूदन इधर ही चले आ रहे
हैं । अकस्मात इस विपत्ति की घड़ी में श्रीकृष्ण को आता देख द्रौपदी खुशी से खिल उठी । जैसे ही श्रीकृष्ण आये, द्रौपदी ने कहना शुरू किया - भले आये माधव, देखो न मैं कैसी विकट परिस्थिति में पड़ गई हॅू । अब तुम्ही कुछ करो । द्रौपदी ने सारी बातें श्रीकृष्ण को बताई ।
लेकिन यह क्या माधव ने तो उनकी बात पर ध्यान ही नहीं दिया । उल्टे कहने लगे कि द्रौपदी मुझे बड़े जोरों की भूख लगी है । कुछ खाने को दो । पहले अपनी भूख मिटा लॅू फिर उस दुर्वासा के बारे में सोचा जाएगा ।
द्रौपदी तो जैसे आसमान से जमीन पर गिर पड़ी हो । यह क्या जिस पर सारा आश लगी थी, वही इस तरह की बातें कर रहे हैं । कहॉ इस स्थिति से निकालने के लिये कुछ करते तो उल्टा मेरे लिये और मुसीबत खड़ी कर रहे हैं । इन्हें बता चुकी हूॅ कि घर में कुछ भी नहीं है, फिर भी खाने को मॉग रहे है । भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं । मैं ने क्या गलती कर दी है जो मुझे ऐसी सजा दे रहे है । भला भगवान को मेरे साथ ऐसा करना चाहिए ।
द्रौपदी अभी इन्हीं बातों पर विचार कर रही थी कि मधुसूदन ने पुनः कहा-
हे सखी देर मत करो । जल्दी लाओ । बड़ी भूख लगी है ।
द्रौपदी ने कहा - लेकिन क्या लाऊॅ भगवन । बताया तो घर में कुछ भी खाने को नहीं है ।
श्रीकृष्ण ने जवाब दिया - अरे कुछ भी लाओ न । अच्छा, वो अक्षय पात्र लाओ जरूर उसमें कुछ न कुछ होगा ।
द्रौपदी वो खाली अक्षय पात्र ले कर आई और बोली -
लो स्वयं देख लो, इसमें कुछ भी नहीं है ।
भगवान ने वो अक्षय पात्र ले लिया और उसमें गौर से देखा । पात्र के गले के पास साग का एक छोटा सा टुकड़ा सटा था । भगवान उस साग के टुकड़े को खा गये और बोले -
इस साग से संसार के सारे प्राणि, जीव और भूत तृप्ति हों ।
भगवान ने जब इन शब्दों का उच्चारण किया उस समय दुर्वासा और उनके शिष्य नदी के जल में डुबकी जगा रहे थे । डुबकी लगा कर जैसे ही वे सभी बाहर निकले, अकस्मात उन्हंे लगने लगा कि उनका पेट तो गले तक भरा हुआ है । अब तो वे अन्न का एक दाना भी मुख में नहीं डाल पाएगें ।
दुर्वासा ने सोचा कि मैं तो उधर भोजन बनाने के लिये कह के आया हॅू और इधर सारे के सारे लोग खाने मे असमर्थ हैं । अब जा के युधिष्ठिर से क्या कहेगें । वह भी भगवान का बड़ा भक्त है और सत्यवादी है । अगर वह नाराज हो गया तो लेने के देने पड़ जाएगें । अब यहॉ से भाग जाने में ही भलाई है । और दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ भाग खड़े हुए । इसप्रकार आई हुई विपत्ति टल गई ।
कभी कभी हम भी सोचते है - भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं । मैं ने क्या गलती कर दी है जो मुझे ऐसी सजा दे रहे है । भला भगवान को मेरे साथ ऐसा करना चाहिए । लेकिन भगवान जो कुछ भी करते हैं हमारे भले के लिये करते हैं । उसमें हमारी अच्छाई ही छुपी रहती है, भले कुछ समय के लिये वह हमें बुरी और नागवार लगे । विभु सदैव शुभ करते हैं
No comments:
Post a Comment