प्रेम
मॉ अपने बेटे को बहुत प्यार करती है । बेटा अपने मॉ को प्यार करता है । पति अपने पत्नी को प्यार करता है । पत्नी अपने पति को प्यार करती है । लोग ऐसा ही सोचते है, लेकिन यह सच नहीं है । सच तो यह है कि कोई किसी को प्यार नहीं करता है । अगर कोई किसी से प्यार करता है तो अपने आप से प्यार करता है । हॉ यह एकदम सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल स्वयं को प्यार करता है ।
हमारे मन के अन्दर एक भावना उत्पन्न होती है । आध्यात्मिकों के अनुसार भगवान या प्रकृति इस भावना के उत्पत्ति के कारण है, जब कि वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे मस्तिष्क में एक प्रकार के हारमोन का श्राव होता है, जो इस प्रकार के भावना के उत्पत्ति का कारण होता है । इस भावना के तहत हमे किसी व्यक्ति विशेष के नजदीक रहने में, उसकी बात मानने मे, उसकी बात सुनने मे, उसका खयाल रखने में, उसकी फरमाईसें पूरी करने में एक खुशी का अनुभव होता है । हम अपनी खुशी के लिये, अपने उस भावना की तुष्टि के लिए, ये सब करते हैं और लोग करते है कि हम उक्त व्यक्ति को प्यार करते है । हमे उस व्यक्ति के कुशल क्षेम का पता नहीं चलता है तो हम अन्दर से बेचैन हो जाते हैं । हम अपनी बेचैनी को शांत करने के लिये उसके बारे में जानना चाहते है, उससे संपर्क करना चाहते है और लोग करते है कि हम उसे प्यार करते है । अब आप स्वयं बनाइये कि हम अपने आप को प्यार करते है या किसी अन्य व्यक्ति को ?
केवल मनुष्यों में ही यह भावना नहीं होता है । बरन यह भावना पशु और पक्षियों में भी होती है । जो बिल्ली अपने छोटे बच्चे को अपने मुख में खाना ला कर खिलाती है वही बिल्ली, उसी बच्चे के बड़े हो जाने पर रोटी के टुकड़े को उससे छीन के खा जाती है । एक छोटा बच्चा हम समय अपनी मॉ के आस पास रहना चाहता है, अपनी मॉ के छोटी से छोटी इच्छा का खयाल रखता है, वही बड़ा होने पर वैसा नहीं करता है तो क्यों ? क्यों कि वह वही करता है और उतना ही करता है जिससे उसकी वो भावना तुष्ट हो जाती है । हम कहते हे कि बच्चा बड़ा हो कर मॉ से उतना प्यार नहीं करता है ।
क्या मैं गलत हूॅ कि प्रत्येक व्यक्ति केवल और केवल स्वयं को प्यार करता है ।
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