Sunday, 26 January 2014

मैं सत्संग आदि में विश्वास नहीं रखता हॅू । मेरा मानना है कि ये सत्संगी ऐसा क्या बतावेगें जिसे हमलोग नहीं जानते या जो हमारे धर्मग्रन्थों यथा रामाणण महाभारत गीता या वेद पुराण और उपनिषद में नहीं है । सही बात भी है सत्संग में तो आज के पहले मैं कभी नहीं गया था, लेकिन टी0भी0 पर देखा था । ये लोग ऐसा कुछ भी नहीं बताते जो हमारे ग्रन्थों से परे हो ।
लेकिन आज जब मैं सत्संग में गया तो इस सत्य से परिचित हुआ कि क्यों तुलसीदास और अन्य विद्वान सत्संग को इतना महिमा मंडित करते है ।
हॉ यह सत्य है कि वे हमारे धर्मग्रन्थों से ज्यादा अथवा अलग कुछ भी नहीं बताते लेकिन कुछ विशेषताये इसमे हैं । पहली बात तो यह है कि ये सरल शब्दों का प्रयोग करते है जो प्रत्येक व्यक्ति को ग्राह्य होता है । दुसरी बात जो मुझे प्रभावित किया वह है - वातावरण । ये लोग ऐसा वातावरण बना देते है कि हम न चाहते हुए भी कुछ देर के लिये ईश्वरोन्मुख हो ही जाते है । जैसे बीरता और कायरता संक्रामक होती है । शायद वैसे ही भक्ति भी संक्रामक होती है । वहॉ जब हम अन्य लोगों को ध्यान लगाये देखते है तो बरबस ध्यान लगाने का मन करने लगता है । घर पर तो यह एक मिनट भी अपने सेलफोन से दूर नहीं रह सकते है और यह फोन कब हमारा ध्यान भंग करा देगा कोई नहीं कह सकता है । ये लोग जबरन सेलफोन से हमे कुछ देन तक दूर करके वाह्य जगत से हमारा संपर्क तोड़ देते हैं । जो ईश्वर भक्ति के लिये आवश्यक है । शास्त्रो को पढ़ कर उन्हें रख नहीं देना चाहिए बरन उन्हें बार बार पढ़ते रहना चाहिए । गोस्वमी जी का यह मत है । सत्संग से शास्त्रों का पुनरावलोकन हो जाता है ।
मैं यह मानता था कि जो संत कह गये है वह सही है, चाहे उसका प्रमाण हो अथवा न हो । अब इस बात पर मेरा विश्वास और दृढ़ हुआ है । अब मैं समझा कि गोस्वामी तुलसीदास सत्संग की इतनी महिमा क्यों बखानी है ।

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