Thursday, 16 February 2012

यह मुस्कान निश्चित रूप से मोनालिसा की मुस्कान से ज्यादा सुन्दर है । अगर विश्वास नही तो खुद ही देख लें ।

ये मुस्कान-
जैसे जाड़े की धूप ।
ये मुस्कान-
जैसे फूल पर अटकी ओस की नन्ही सी बूँद ।
ये मुस्कान-
जैसे सरिता की चंचल धार ।
ये मुस्कान-
जैसे दूर से आती बंशी की मधुर तान ।
ये मुस्कान-
जैसे फूलो का पराग ।
ये मुस्कान-
जैसे ममता को पुकारती शिशु के गले से निकली हूकार ।

निश्चित रूप से अंतिम उपमा को छोड़ कर सभी उपमा कहीं न कहीं किसी न किसी लेखक या कवि द्वारा प्रयोग किये जा चुके हैं । परन्तु अंतिम उपमा मौलिक है ।

आपने जरूर उस नन्हें से बच्चे को देखा हो जो अपनी मॉ को देख कर हाथ पॉव चलाने लगाता है और उसके गले से हॅू हॅू हॅू हॅू की आवाज निकलने लगती है ।

वो आवाज जितनी सुन्दर ओर मधुर होती है । उतनी ही सुन्दर और मधुर ये मुस्कान भी है ।

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